Monday, July 31, 2017

स्वच्छ भारत अभियान


अाज हमारे समक्ष ढेर सारी परेशानीयाँ है, उनमे से कुछ प्रमुख समस्यायें जैसे - महंगाई, गरीबी, भुखमरी, जनसंख्या वृध्दी और पर्यावरण प्रदुषण । और इस प्रदुषण की वजह से ही ना सिर्फ हमारे देश कि वरन पूूरे विश्व कि हजारो, लाखो जिन्दगीयां प्रभावित हो रही है। हाल ही मे हुए एक ताजा शोध के अनुसार विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित बीस शहरों मे से सबसे ज्यादा तेरह भारत के हैं, और आपको यह जानकर कतईं आश्चर्य नही होगा कि उनमें से सबसे ज्यादा प्रदूषित दिल्ली, कोलकता, मुंबई और चेन्नई है।हमारे शास्त्रों मे कहा गया है कि एक वृक्ष दस पुत्रो के समान होता है, अतः अगर हम एक वृक्ष काटते है तो हमे दस मनुष्यों की हत्या का पाप लगता है। इसलिए हमने वायु प्रदान करने वाले वृक्ष को नही काटना चाहिए। हमें इस अनमोल जीवनको बचाने हेतु अपने वातावरण और परिवेश को स्वच्छ बनाना होगा, और न केवल यह हमारे स्वस्थ जीवन के लिये अत्यंत आवश्यक है अपितु यह हमारा नैतिक कर्तव्य भी है। हमें स्वच्छता को आवश्यक या जरूरी नही समझना चाहिए बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन का अभिन्न बना लेना चाहिए। मेरा आप सबसे बस यही अनुरोध है कि आप सब इस अभियान को सफल बनाने हेतु आगे आयें, क्योंकि एक अच्छी सरकार सिर्फ अच्छी योजनाएँ बना सकती है लेकिन अगर उसे अच्छी तरह से क्रियान्वित करना है तो जनता जनार्दन का उचित सहयोग परम आवश्यक होता है। और मैं आप सभी मित्रों से सहयोग की। अपेक्षा रखता हूँ।

अब बहुत हो चुका,
हद हो गयी है ।
देश तो वही है,
लेकिन लोग नए है ॥

हमारा शरीर तो,
भले ही नया है ।
लेकिन हम आदतो से तो,
वर्षो पुराने हो गए है ॥

हम हमेशा से गन्दगी में,
रहना पसंद करते थे ।
आज भी कूड़ा-करकट,
में ही रहा करते थे ॥

हम भारतीय भी गन्दगी पसंद करने में,
चार-प्रकार के होते है ।
अब हम गन्दगी पर ध्यान दिए बिना,
दिन-रात सिर्फ सोते है ॥

कुछ तो अपने बारे में,
भी नहीं सोचते है ।
गंदे कपडे और गन्दगी ,
अंदर-बाहर कूड़े भरे होते है ।।

कुछ लोग खुद तो,
साफ रहा करते है ।
लेकिन गली और कूचे,
गन्दगी से भरे होते है ।।

दसरे लोग घर-आँगन,
तो साफ रखते है ।
लेकिन गली और कूंचे,
गन्दगी से भरे होते है ॥

बहुत जी लिया,
खुद के लिए ।
मै देश के लिए,
अब जीना चाहता हूँ ॥

अब हम मिलकर,
भारत को स्वच्छ बनाएंगे ।
फिर पुरे विश्व के लिए,
विश्व-गुरु बन जायेंगे ॥

विश्व की नजरो में,
अपना स्थान बनाएंगे ।
लोग हमारे निर्मलता और स्वच्छता,
का गान गाएंगे ॥

आओ हम सब मिलकर करें,
एक स्वच्छ और सुन्दर भारत का निर्माण ।
यहाँ के स्वच्छ गली, सड़क और कूचे,
बढ़ाये इस भारत देश का नाम ॥

आप सभी यहाँ आमंत्रित है -: स्वच्छ भारत अभियान

धन्यवाद ।

Sunday, July 30, 2017

बख्शीस




अनुपमा (सोनाली से)-:  ''सोनाली ! इधर आ । मै तुझे खिलौना दिखाती हूँ ।''

सोनाली नीचे पोछा करती हुयी, एक पल के लिए पीछे पलटी, लेकिन पूर्ववत अपने काम में लग गयी, जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो । शायद उसे पिछली घटना का स्मरण हो आया था, जब बड़ी मालकिन ने सिर्फ इसीलिए उसे पिट दिया था की उसके पास एक चॉकलेट का कवर था, जो गलती से अनुपमा का था । यह तो बाद में अनुपमा ने आकर बताया की उसने ही यह कवर सोनाली को चॉकलेट खाने के बाद दिया था ।

इस घटना के बाद सोनाली की माँ ने सोनाली को हिदायत देते हुए कहा -: ''अब उसके पास भी मत जाना, नहीं तो फिर मार पड़ेगी और फिर प्यार जताते हुए कहा देखो तो कैसे मारा है इस फूल सी बच्ची को, आने दो मालिक को, देखना मै खुद मालकिन की शिकायत करूंगी ।'' 

लेकिन सोनाली के माँ तो यह जानती थी की यह सिर्फ दिखावा है असल में तो वह अपना मुह भी नहीं खोल सकती है, दरअसल उसका पूरा परिवार, और ना सिर्फ उस अकेले का परिवार बल्कि सारा गाँव ही बड़े मालिक का बंधुवा है। उस गावँ के निवासी और उनके पूर्वज दसको से ठाकुर की गुलामी करते आ रहे है ।

लेकिन अनुपमा फिर से (सोनाली से) -: ''सोनाली आ । ये देख मेरी नयी गुड़िया जो  मेरे पापा ने मेरे इस जन्मदिन पर दिया था ।''

शायद यह किसी छोटी बच्ची के लिए एक अग्नी परीक्षा से काम नहीं था की उसके सामने उसका  पसंदीदा खिलौना रखा हो और वो उसे अपने हाथो से छू  भी ना सके, और काफी देर के जद्दोजहद के बाद वो खुद को रोक ना सकी। और डरते - डरते कदमो से अनुपमा के पास गयी ।

और जब खिलौने को देखा तो एकदम से देखती ही रह गयी, इससे पहले उसने कभी ऐसा खिलौना देखा ही नहीं था, यह तो उसके लिए एक स्वप्न के जैसा ही था । कुछ देर तक एकटक देखने के बाद, उसका मन हुआ की वह एक बार उसे अपने हांथो से छूकर देखे, और उसने अपने हाँथ बढ़ाने चाहे लेकिन उसके हाँथ तो जैसे बेजान थे और वह चाहकर भी अपने हाथ को हिला तक ना सकी । अब अनुपमा ने एक-एक करके उसे अपने सारे खिलौने दिखाए, जैसे- अपनी पुरानी गुङिया और गुड्डा, हाथी-घोङे और भी ना जाने क्या-क्या ।

सोनाली एकटक ललचायी नजरों से बस खिलौनों को देखे जा रही थी, और वह खिलौनों को देखने मे इतनी मगन हो गया कि उसे आसपास का कुछ ध्यान ना रहा, लेकिन कुछ छण बाद, जब वह वापस चेतना मे आई तो उसने देखा माँ सजल नेत्रो से उसे ही देख रही थी, और जैसे ही दोनों कि नजरें आपस मे मिलीं, तो माँ हड़बडाते हुये बोली- "चल छुटकी!  जल्दी से काम खतम कर, मालकिन आती ही होंगी। अगर समय पर काम खत्म ना किया तो मालकिन गुस्सा होंगी।''

फिर सोनाली अनिच्छा से उठी और जल्दी-जल्दी अपना काम समेटने लगी।

इस तरह धीरे-धीरे लगभग छः महीने बीत गये, सोनाली हर सुबह अपनी माँ के साथ आती और शाम को घर
चली जाती।अनुपमा का दाखिला शहर के किसी बड़े स्कूल मे हो गया था, और वह होस्टल मे रहकर पढ़ाई पुरी
करने लगी। छुट्टियों मे कभी-कभी घर आती थी, इसी वजह से सोनाली उदास रहने लगी, पता नही कहां खोई
रहती थी, उसका काम मे भी मन नही लगता था और इसी वजह से उसे आये दिन मालकिन से डाँट सुननी
पड़ती थी।

एक दिन सोनाली काम खत्म कर अपनी माँ के साथ घर जाने के लिए निकली ही थी कि उसे किसी ने पुकारा।सोनाली को खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि बड़ी मालकिन ने आज उसे उसके नाम से पुकारा, वह यह सोच ही रही थी कि दूसरी आवाज गुंजी- "सोनाली।"

सोनाली - "ज्ज्जज....जी बड़ी मालकिन।" और बिना देर कि ये सोनाली उनके पास पहुँची।
तो मालकिन ने कर्कश आवाज मे पुछा- "कहां रह गई थी तू, यह अनु के खिलौने हैं, अब अनु तो यहाँ है नही, इसे खेलने के लिए इसीलिए इन्हें तुम ले ले।''

इतने सारे खिलौने देखकर तो वह फूली नही समायी। जिस बड़ी मालकिन को वह स्कूल की मास्टरनी से भी
ज्यादा कठोर समझती थी, वह तो मन से बहुत निर्मल है। तभी बड़ी मालकिन ने खिलौनों की ढेर से एक
गुड़िया निकाली। इस गुड़िया का एक हाथ टुट चुका था, कपड़े फट चुके थे, और जो शेष बचे भी थे, एकदम गन्दे
हो चुके थे। ध्यान से देखा तो पता चला कि यह तो वही गुड़िया है, जिसे अनुपमा के पिताजी ने उसे उसके
जन्मदिन पर दिया था और सोनाली का मन तो उसे सिर्फ एक बार छुट्टियों लेने को लालायित था। किन्तु आज
क्या हुआ उसका गुड़िया के प्रति जो दिवानगी थी, जो जुनून था वह पुरी तरह से खत्म हो चुका था।उसने गुड़िया
लेने मे अनिच्छा प्रकट कि, किन्तु तभी उसकी माँ ने कहा - "ले ले छुटकी! बड़ी मालकिन खुश होकर दे रही है।"

लेकिन सोनाली ने प्रतिक्रिया नही की, जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो। फिर बड़ी मालकिन ने गुड़िया उसके हाथ
पर मार,भुनभुनाते हमसे एक तरफ चल दी। सोनाली फिर भी वहीं खड़ी रही।

फिर माँ ने उसके सिर पर अपना हाथ रखा और प्यार से बोली- "ऐसे क्या देख रही है? बड़ी मालकिन किसी को
कभी कुछ नहीं देती हैं। पहली बार तुझे खुश होकर बख्सीस दिया है, तू सचमुच बहुत भाग्यशाली है।"

पर सोनाली के मन मे कुछ और ही चल रहा था कि यह कैसी बख्सीस है, जिसे पाकर वह खुश नहीं है, देने वाला
भी खुश नही है, लेकिन उसकी माँ खुशी से फूली नहीं समा रही हैं। और सोनाली मन ही मन फुसफुसाई - '' यह कैसी बख्शीस|''

Thursday, July 27, 2017

कसूरवार कौन ?

कसूरवार कौन ? 


बात तब की है जब मै सिर्फ १२ साल का था | मै अपने जन्म स्थान, उत्तरप्रदेश के भदोही जिले में अपने माता-पिता के साथ रहता था | वही भदोही जो अपने कालीन निर्यात के लिए विश्व विख्यात है | मेरा परिवार एक संयुक्त परिवार है, जहाँ मेरे दादाजी अपने दो भाइयों और उनके पुरे परिवार के साथ रहते है | और मै खुद को इसीलिए सौभाग्यशाली समझता हूँ, और पुरे परिवार के साथ बिताये गए वो पल मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत और ताउम्र यादगार रहने वाले पल थे | मेरे दादाजी मुझसे बहुत स्नेह करते थे और एक वही थे जिनसे मै हठ करके अपनी बात मनवा लेता था | वे मुझे प्यार से ''बऊ'' बुलाते थे | मै हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभी जिद करके साईकिल से बाजार जाकर घर के लिए कुछ सामान ला लेता था | लेकिन उसके पीछे मेरा एक स्वार्थ छुपा हुआ था, जिस रहस्य को मै और मेरे दादाजी के सिवाय कोई नहीं जानता था, जब मै सामान लेन की जिद करता तो पहले तो दादाजी मनाकर देते लेकिन मेरे बालहठ के आगे वे भी कितने देर टिक पाते, और अंत में मुस्कुराते हुए मुझे पैसे देते हुए प्यार से कहते  - '' ठीक है चले जाओ, लेकिन संभल के जाना |''
और जब मै पैसे देखता तो उसमे सामान की तुलना में ज्यादा पैसे हुआ करते थे |

एक दिन मै सुबह उठा तो हल्की-हल्की  ठंढ लग रही थी, और मै घर के दरवाजे के पास बैठा था कि अचानक हल्के स्वर में पीछे से दादाजी की आवाज सुनायी दी - '' बऊ ! ''
मै अंदर गया तो अपने कमरे में लेते हुए थे | अंदर जाते ही उन्होंने मुझे पैसे देते हुए कहा - ''बाजार जाकर मेरा बिस्कुट लेकर आओ |''

मैंने पैसे लिए और जाने की लिए मुड़ा ही था की हमेशा की तरह उन्होंने हिदायत देते हुए कहा - ''आराम से जाना, और जल्दी वापस आ जाना |''

मैंने भी बिना उनकी तरफ देखे स्वीकृति से अपना सर हिला दिया | और सायकिल पर सवार होकर बाजार कि तरफ निकल पड़ा.

मैने बाजार पहूचकर जल्दी-जल्दी सामान लिया और वापस लौटने के लिए साइकिल उठायी ही थी की अचानक ही मेरा ध्यान सड़क के किनारे खड़ी एक महिला पर पड़ी, पास जाकर देखा तो अरे ये क्या यह तो रुक्मिणी बुआ है| इनकी हमारे गाँव मे एक छोटी सी दुकान है, और वे हमेशा पैदल ही बाजार जाकर समान लाती थी| लगता है आज उनका सामान का थैला कुछ ज़्यादा वज़नदार हो गया था जिसकी वजह से वे उसे नही ले जा पा रही थी| मैंने देखा तो वे मुझे ही देख रही थी, और वे मुझसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन कह नहीं पा रही थी । मुझे जल्दी थी, लेकिन मै खुद को रोक नहीं सका, और पास जाकर पूछा - '' क्या हुआ बुआ ?''

उन्होंने सकुचाते हुए कहा - ''नहीं....... कु........ कुछ नहीं ।''

लेकिन मेरे जोर देने पर उन्होंने बताया - '' सामान लेने आयी थी, लेकिन वजन ज्यादा होने के कारण नहीं ले जा पा रही हूँ ।''

तो मैंने कहा - ''ठीक है, मै लिए चलता हूँ ।''

तो वह मना करने लगी, लेकिन इससे पहले की वह कुछ बोल पाती मैंने उनका झोला (बैग) अपने केरियर (सायकिल का पिछला हिस्सा, जो वजनी सामान ढोने के काम में आता है) पर रख लिया। तो वह भी मान गयी और हम दोनों पैदल ही घर की तरफ चल दिये। हमारे घर से बाजार की दूरी तकरीबन दो किलोमीटर थी, इसीलिए पहुचने में लगभग एक घंटे का समय लग गया। और इस चक्कर में मै यह भूल गया की मुझे घर जल्दी जाना था। हम घर के करीब ही थे की सामने से छोटे चाचाजी आते दिखाई दिए।
और पास आकर उन्होंने पूछा - '' इतनी देर कैसे हो गयी ?, और पैदल क्यों आ रहे हो ?''

इससे पहले की मै कुछ बोल पाता, उन्होंने फिर क्रोधित होते हुए पूछा - ''यह सामान किसका है ? '' 

तो मैंने बताया की सामान तो रुक्मिणी बुआ का है और मेरे कुछ और बोलने से पहले ही वह बुआ पर बिफर पड़े। उन्होंने कहा - ''तुम्हे इतनी भी समझ नहीं है, इस छोटे से बच्चे के ऊपर इतना सामान लाद दिया है ।''

और इतना कहकर उन्होंने रुक्मिणी बुआ का सारा सामान निचे फेक दिया, जो पुरे सड़क पर बिखर गया। मैंने चाचाजी को समझाने और रोकने की पूरी कोशिस की लेकिन उन्होंने मुझे डाँटकर चुप करा दिया, चुपचाप घर जाने के लिए कहा। मैंने एक असहाय सी नजरो से रुक्मिणी बुआ की तरफ देखा तो उनकी आखे सजल हो चुकी थे और कभी भी अश्रुधारा बह सकती है। वे नजरे झुकाये सड़क के किनारे खड़ी थी। चाचाजी ने न जाने उन्हें कितना बुरा-भला कहा, लेकिन वह सब चुपचाप सब सुनती-सहती गयी। और अंत में चाचाजी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर चल दिए, लेकिन रुक्मिणी बुआ तो अब भी वही खम्भे के सामान अविचलित सी खड़ी है। मेरी आँखे निरंतर उनको ही देखती रही, और खुद से काफी जद्दोजहद के बाद उनकी आँखों से आंसू निढाल हो गए। और धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से ओझल हो चुकी थी। मै खुद उस समय समझ नहीं पाया की कसूरवार कौन है ? - मै, बुआ, चाचाजी या कोई कसूरवार है भी की नहीं ?

इस घटना को आज तकरीबन आठ साल बीत चुके है, और शायद वह भी इस घटना को भूल चुकी थी, लेकिन आज भी जब-जब रुक्मिणी बुआ मेरे सामने आती है, तो मेरी नजरो के सामने वो मंजर चलचित्र की भाँती चल पड़ती है। उन्हें मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रही और ना ही उन्होंने किसी से इस घटना का जिक्र किया शायद इसीलिए मेरा अपराध बोध बढ़ जाता है। उस घटना के बाद मै उनसे ठीक से आँखे मिलाकर बात भी नहीं कर पाता हूँ। जब आज मै यह सच्ची घटना से आप सब को रूबरू कराने जा रहा हूँ, खुद से यही सवाल कर रहा हूँ की कसूरवार कौन ?

Wednesday, July 19, 2017

मूर्ख राधेश्याम



"अरे ओ राधे! अभी उठा की नहीं?" - पुष्पा जी कर्कश स्वर में बोली|

राधे दौड़ता हुआ आया| एक १२ वर्षीय लड़का जोर-जोर से हाफते हुआ चला आ रहा था|
"जी माताजी|" सांसो को रोकते हुए बोला| 
"मै तो बाबूजी के लिए दातुन तोड़ रहा था, नीम के पेड़ से|" राधेश्याम ने सफाई देनी चाही लेकिन पुष्पा जी ने डांटकर चुप करा दिया| और बोली - "चल यह पानी की बाल्टी गुसलखाने तक पंहुचा दे, बाबूजी को नहाना है, और फिर ज्योती दीदी और निलेश भैया के रूम में उनको उठाकर चाय दे देना, और हाँ चाय लेकर जाना तभी उन्हें उठाना, नहीं तो उनका सर दर्द करने लगेगा|"

राधे चाय लेकर ऊपर गया, तो जोर से आवाज आई, पुष्पा जी दौड़कर ऊपर की और गयी तो देखा| राधेश्याम कोने में खड़ा था मौन साधे, और आँखों में पानी उठने लगा था, ऐसा लग रहा था की बस अभी उसके बांध को तोड़कर बह उठेंगी| 

पुष्पा जी ने कमरे में पहुचते ही स्थिती को समझ लिया जैसे की, यह रोज की सामान्य घटना हो| उन्होंने निलेश को डांटा - "तुम्हारे हाँथ बहुत चलने लगे है, उस पर हाथ मत उठाया करो, तुम तो जानते हो वह मूर्ख है|"

और कमरे से बाहर जाने लगी, तो राधेश्याम उनके पीछे हो लिया| बाहर निकलकर पुष्पा जी ने कहा जब मैंने तुझे बोला था की चाय लेकर जाना फिर उन्हें जगाना, तो तुमने ऐसा क्यों नहीं किया|
तो पहले तो पुष्पा जी चुप हो गयी, फिर टालने के अंदाज में बोली अच्छा जा थोड़ी सी चाय बची है तपेले में, गर्म करके पीले, और सारे बर्तन धुल देना|"
और राधेश्याम के चेहरा चहकने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो|
राधेश्याम मनोज के सगे भाई का लड़का था, राधे के माता-पिता इस दुनिया से तभी चल बसे, जब राधे ५ साल का था| तो मनोज राधे को लेकर बनारस स्थित घर में ले के चले आये| 
मनोज जी बिजली विभाग में है, और उनकी आमदनी काफी अच्छी है बड़ा बेटा निलेश जो १२वी की परीक्षा तो पास कर चुका है लेकिन अभी मोबाइल का बड़ा स्टोर खोलना चाहता है, छोटी बेटी ज्योती ने इसी वर्ष १०वी की परीक्षा दी है| 
सभी घर के सदस्य उसे नौकर के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते है, लेकिन मनोज जी उसमे और निलेश में कोई फर्क नहीं समझते है| लेकिन उनकी नौकरी ही ऐसी है की सुबह नौ बजे तक निकल जाते है, और रात में ११ बजे आते है| 
सभी लोग उसे हर छोटी बात पर डाँटते रहते है, लेकिन वो पहले तो नाराज होता, उसका मन करता की सबको छोड़कर चला जाए, लेकिन थोड़ी देर बाद प्रसन्न चित्त हो जाता, और काम में जुट जाता| उसकी दिनचर्या थी की सुबह ४ बजे उठकर सभी काम निपटाले और ६ बजे पुष्पा जी को उठाये| और रात में सबके सो जाए के बाद भी १-२ बजे तक छतपर जगता रहता| मनोज जी का प्यार ही था जो राधे को रोके हुए था इस घर में| और एक दिन मनोज जी का भी हाथ उठ गया उसपर, बिना खाए मनोज जी भी ऑफिस चले गए, उन्हें पछतावा बहूत हो रहा था| इधर राधे की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी हो, रात को देरतक आसमान में निहारता रहा, न जाने नींद क्यों नहीं आ रही थी उसे| 
और सुबह मनोज जी उठे तो दातुन की जगह उन्हें दातुन नहीं मिली तो बोले - "राधे! फिर कुछ देर रुककर बोले राधे!" 
तब उन्होंने पुष्पा जी से पुछा - "अरे राधे कहाँ गया? मेरे लिए दातुन भी नहीं रखा|"
घर में सभी उसे ही याद कर रहे थे, कोई चाय के लिए, कोई दातुन के लिए, कोई पानी के लिए और कोई उसकी हँसी के लिए| मनोज जी समझ गए की, वो अब आजाद हो गया है, अब वापस नहीं आयेगा| 
उनका स्वार्थ तो यह कह रहा था की वो वापिस आ जाये, उसे कोई कुछ नहीं कहेगा| लेकिन दिल कह रहा था, की वो जहाँ भी रहे खुश रहे, लेकिन वापिस यहाँ ना आये| सभी दुहाई दे रहे थे, राधे आ जाये तो मै उसे कुछ नहीं कहूँगा, चाय भी मै उसे दूंगा, लेकिन क्या फायदा, वो तो जा चूका था|
हर सुबह वही याद आता सभी को, आज इतने वर्ष हो गए इस घटना को लेकिन अभी भी लोग उसे भूले नहीं है|
मनोज जी और यह घर तो आज भी उसके मुस्कुराते हुए चेहरे की तलाश कर रहे है| और अभी घर में यह आवाज नहीं गुजती - "मूर्ख राधेश्याम|"


Saturday, July 1, 2017

चिट्ठा दिवस



आप सभी को ब्लॉगर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ|
ब्लॉग तो पहले भी लिखे जा रहे थे, लेकिन हिन्दी भाषा में ब्लॉगो के लिखे जाने की शुरुआत कुछ वर्ष पहले हुई| लेकिन शुरुवात मे हिन्दी प्रेमीयों के पढने का माध्यम या तो पुस्तकों को बनाते थे या पत्रिकाओं को| लेकिन धीरे-धीरे हिन्दी ब्लॉगो पर पाठको की संख्या मे असाधारण बढ़ोतरी ने हिन्दी लेखको को ब्लॉग लिखने के लिए प्रोत्साहित किया| और आज तो हिन्दी पाठको के लिये एक सशक्त माध्यम के रूप मे उभरा है हिन्दी ब्लॉगींग| और ब्लॉग से हिन्दी के दिन सुधरे, ना सुधरे लेकिन हिन्दी से ब्लॉगींग के दिन जरूर सुधरेंगे|
और हमारी तो यही विश्वास है कि हिन्दी चिट्ठा और चिट्ठाकार इसी तरह प्रगति करते रहे| सभी ब्लाग लेखको और पाठको को चिट्ठा दिवस की हार्दिक बधाई|

#हिंदी #ब्लॉग

मेरे मन की

मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा...