Friday, June 23, 2017

खूबसूरत


दोपहर के दो बज गये थे, पार्क से सब जा चुके थे| वही पार्क मे एक पेड़ के नीचे बेंच पर बैठा 8 साल का सीबु सोच रहा था कि सुबह दो अंकल आपस में बात कर रहे थे कि छोटे बच्चे तो भगवान का रुप होते है| उनकी शरारतें भी खुशी देती हैं| और अपने मित्र के छ: साल के लड़के को देखकर बहुत खुश हो रहे थे|
अभी सीबु यह सोच ही रहा था की बाहर से वाचमैन के चिल्लाने की आवाज़ आई - "ए लड़के यहाँ क्या कर रहा है? चल निकल इधर से|"
सीबु उठकर वहाँ से जाने लगा, लेकिन अभी वाचमैन रुका नही| वह बोलता गया -"पता नही कहाँ-कहाँ से आ जाते है| इनके माँ-बाप भी पैदा करके छोड़ देते हैं| और ये दिनभर आवार कुत्तो की तरह घूमते रहते है| काम के ना काज के, दुश्मन अनाज के|"
अभी वह और कुछ कहता इससे पहले से सीबु पार्क से जा चुका था| और यही सोचकर खुद को तसल्ली दे रहा था कि शायद मै बड़ा हो गया हूँ या मै उस लड़के जैसा खूबसूरत नही हूँ|

मेरे मन की

मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा...