Monday, June 22, 2015

शर्मीली



शर्मीली...... एक ग्यारह वर्षीय लड़की जो अपने नाम की ही तरह काफी  शर्मिली है | शर्मीली फैज़ाबाद जिले के सोनापुर गाँव की रहने वाले रमेश नामक कुम्हार की इकलौती लड़की थी | रमेश मिट्टी के बर्तन बनता और बाजार जाकर उन्हें बेच आता, और रमेश की पत्नी सुलेखा आस-पड़ोस के घरों का चूल्हा चौका कर किसी तरह घर को चलाते थे | सुबह होते ही नित्यकर्म के बाद रमेश दूर नदी से बर्तन बनाने लायक मिट्टी ले आते और दोपहर में उसे अच्छे से पानी में भिगो देते थे,और शाम में बर्तन बनाते और उन्हें बाजार जाकर बेच आते, यही उनकी रोज की दिनचर्या थी | शर्मीली सुबह उठकर घर के काम में  माँ का हाथ बटाती और दस बजते ही गाँव में स्थित एक प्राइवेट स्कूल, क्योकी गाँव के प्राथमिक विद्यालय में तो भेड़, बकरीयों और चरवाहों के अलावा कोई होता न था | पहले प्राथमिक विद्यालय ऐसा ना था, एक मास्टर जी थे जो बच्चो को पढ़ाने आते थे, बच्चो के नाम पर  कुछ दस बच्चे आते थी पढ़ने के लिए, फिर भी मास्टर साहब पुरी-लगन और मेहनत के साथ पढ़ाते थे| फिर दो वर्ष पहले उनका तबादला दूसरी जगह हो गया और फिर तब से आज तक फिर कोई इस विद्यालय में नहीं आया | इन दो वर्षो में भले कोई ना आया हो, लेकिन शर्मीली घर के काम ख़त्म कर विद्यालय पहुच जाती, सिर्फ इस आस में की शायद कोई मास्टर शहब आये हो, उसे बढ़ने हेतु, लेकिन वहां पहुचकर उसे हर बार की तरह निराशा ही हाँथ लगती | शर्मीली वही प्राथमिक विद्यालय की टूटी हुयी खिड़की के पास खड़ी होकर ब्लैकबोर्ड पर लिखे हिन्दी वर्णमाला के लिखे अक्षरों को पहचानने की कोशिश करती, और समझ ना आने पर बस एकटक ब्लैकबोर्ड को देखती रहती, उस पर लिखा था ........क,ख,ग,घ,ड़ |

एक दिन शर्मीली खेल रही थी की उसे उसके सहपाठियों ने बताया की गाँव में एक नया स्कूल खुला है लेकिन फीस ज्यादा है, यह सुनकर शर्मीली के चेहरे पर आयी मुस्कान जाती रही | वह उदास मन से घर चली गयी, क्योकी अब उसका मन खेलने में भी नहीं लग रहा था | घर पहुची तो माँ खाना पका रही थी और बापू  रोज की तरह नदी से मिट्टी लाने गए थे | उसने सारी बात अपनी माँ को बता स्कूल में दाखिला दिलाने की जिद करने लगी |

पहले तो माँ गुस्से में बोली - " यहाँ पूरा बखत काम करने पर खाने को मिलता है, और तुमको पढ़ने की लगी है |
पढ़ के का करेगी, अरे चुढे-चौके पर ध्यान दे, शादी के बाद यही काम में आयेगा, पढ़ाई नाही, समझी |"

लेकिन शर्मीली के बार-बार जिद करने और रोने पर माँ ने उसे बहलाने के लिए कह दिया - "बापू को आने दे, बात करूंगी |"

अब तो शर्मीली बाहर पेड़ के निचे बैठ बापू का इंतज़ार करने लगी, एक-एक पल घंटो के समान लग रहा था |
सिर्फ दस मिनटों में शर्मीली कई बार अपनी माँ से यह सवाल कर चुकी थी की बापू कब आयेंगे, और माँ हमेशा की ही तरह एक ही जवाब देती  - "आते ही होंगे |"

तभी थोड़ी देर बाद शर्मीली के पिताजी आते दिखाई दिए, उन्होंने आकर मिट्टी भिगोई और हाथ मुह धोने लगे | हाथ धुल लेने के बाद शर्मीली की माँ के द्वारा दिए गए गुड़ के टुकड़े से पानी पिया, और रसोई में ही बैठकर सुस्ताने लगे | फिर शर्मीली की माँ सुलेखा जी ने सारी बात रमेश को बतायी, लेकिन रमेश ने यह कहकर मना कर दिया की  पाई-पाई जमा करके हम किसी तरह से इसकी शादी करना चाहते है, अगर बचाया हुआ पैसा पढ़ाई में लगा दिया तो इसकी शादी कैसे करूंगा, और फिर सभी चुप हो गए | शर्मीली जो अब तक फिर से स्कुल जाने के सपने देख रही थी, अचानक से बहूत उदास हो गयी | लेकिन अगले दिन वह अपने स्कुल जाने की लालसा को न रोक पायी | वहा जाकर देखा तो गाँव के बगीचे में ही क्लास लगी हुयी थी, वह एक पेड़ के पीछे छिपकर देखने लगी | अब तो यह शर्मीली की दिनचर्या का हिस्सा बन गयी थी, सुबह जल्दी-जल्दी काम ख़त्म कर कहलाने के बहाने घर से निकल जाती और उसी पेड़ के पीछे से पढ़ती |

एक दिन मास्टर साहब ने अपनी कक्षा ख़त्म की और घर की और निकले अभी वह थोड़ी दूर ही पहुचे थे की अचानक उन्हें कुछ आवाजे सुनायी दी, आगे जने पर आवाजे साफ होने लगी थी .....प,फ,ब,भ,म | मास्टर साहब इतनी तल्लीनता से पढ़ते बच्चे को देखने से खुद को ना रोक पाए, और आती हुई आवाजकी ओर चल दिए| पास जाकर देखा तो एक लड़की जो जमीन पर इस तरह से बैठी हुई थी की उसके सारे कपडे गंदे हो चुके थे, गर्मी के कारण हो रहे पसीने से धुल चिपक रही थी, फिर भी जैसे उसे कुछ होश ही ना हो| वह तो पहले उंगली से जमीं पर लिखती, उसे पढ़ती और फिर हाथो से मिटा देती, और फिर यह क्रम चलता जाता | मास्टर साहब खुद पता नहीं कहा खो गए थे | तभी एक दबी सी आवाज आयी - "जी कहिये |"

मास्टर साहब ने पीछे मुड़कर देखा तो रमेश जी खड़े थे | उन्होंने फिर पुछा - " मै आपकी क्या मदद कर सकता हूँ ?"

मास्टर साहब ने अपना संक्षिप्त परिचत देते हुए पुछा - "आपकी लड़की तो बहूत होनहार है, कहा पढ़ने जाती है?"
तो रमेश ने भारी मन से उत्तर दिया - "साहब पढ़ने कहाँ जाती है, हमारी उतनी आमदनी कहाँ? हम तोरोज कुआँ खोदते है तब पानी नसीब होता है|"

रमेश ने आगे कहना शुरू किया - "पहले प्राथमिक पाठशाला में जाती थी, अब तो वह भी बंद वहो गया, सूना है गावं में कोई नया स्कूल खुला है, लेकिन वह तो फीस लेंगे!"

फिर मास्टर साहब शर्मीली की और मुड़े और बोले - "उस नये स्कूल में पढ़ना चाहती हो |"
शर्मीली ने हाँ में सर हिलाया |
मास्टर जी मुस्कुराकर बोले - "कल सुबह दस बजे आ जाना, पहले दिन देर से मत पहुचना|"
और शर्मीली ने शर्माते हुए अपनी स्वीकृती दी, उसके चहरे पर जो आशा से भरी चमक थी उससे सारा जहां रौशन हो सकता था |



















मेरे मन की

मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा...