Tuesday, July 19, 2016

मेरे मन की




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शुक्रिया

Tuesday, November 24, 2015

असहिष्णुता



असहिष्णुता ....एक ऐसा शब्द, जो कुछ दिनों से मेरे कानो को भेद रहा था और मै ठहरा अनपढ़, गवार, और एक नंबर का आलसी आदमी, मुझे बस अपना काम करना आता है | रोज खाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है | मुझे इससे क्या, की देश के प्रधानमंत्री, किस देश के दौरे पर है या इस देश में कितना कला धन आया | मुझे तो प्रधानमंत्री जी द्वारा किया "अच्छे दिनों" वाला वादा भी याद ना रहा | तो मुझे इस भरी भरकम शब्द "असहिष्णुता" से क्या मतलब, जिसके उच्चारण हेतु मुझे सपथ पत्र की ही भाती रट्टा लगाना पड़ता है, लेकिन मंच पर बोलते समय जुबान फिसलन के कारण "अपेक्षित" का "उपेक्षित" हो ही जाता है | लेकिन फिर भी मैंने इस शब्द की चर्चा के कारण इसके महत्त्व को जानने की कोशिश की, लेकिन अखबारों में तथाकथित विद्वानों और इस देश के महान नेताओं के वक्तव्यों और उनके विचारों को सुनाने के बाद भी कुछ समझ में ना आया | सभी विद्वानों का यही मानना था कि कुछ तो गड़बड़ है | देश में असहिष्णुता बढ़ तो रही है | तो मुझे एक बात समझ में आयी की इन्हें हो न हो देश में बढ़ती हुयी असहिष्णुता दिख तो रही है, मैंने तय किया अब मै भी देखूंगा की यह असहिष्णुता दिखती कैसी है, और यह पहले कहाँ थी, और अब बढ़कर कहाँ तक पहुँच गयी है | मैंने गाँव में ढूढा, कई लोगो से पूछा - "भाई ये असहिष्णुता कहाँ रहती है और कैसे बड़ी है?"
लेकिन किसी ने नहीं बताया तो मैंने सोचा शायद यह असहिष्णुता शायद सिर्फ शहरों में निवास करती है, अगर गाँव में होती तो किसी ना किसी को तो दिखती | मैंने सिर्फ यह सोचकर संतोष कर लिया की कल काम के लिए शहर में जाउंगा तो वहां किसी पढ़े-लिखे टाई वाले से पूछूँगा | लेकिन वहां पूछने पर भी उत्तर नदारद मिला | अंत में मैंने यह सोचकर इस असहिष्णुता के मिलने की आशा छोड़ दी की शायद यह सिर्फ नेताओं और राजनितिक समझ रखने वाले लोगो को ही दिखती है  | लेकिन घर आने के बाद उसी रात मुझे समझ में आया की यह सभी लोग सही कह रहे थे, इस देश में असहिष्णुता बहूत बढ़ गयी है | दरअसल आप तो जानते है की जिस घर में मै रहता हूँ, वहां मेरे सथ मेरे कुछ खटमल मित्र भी रहते है | हुआ यूं की उसी रात मै जब सोया था तभी मेरे कुछ  खटमल मित्र आये और मुझे नोचने लगे | तत्पश्चात, मेरी नीद भी खुल गयी, उठकर देखा तो ये मुझे जैसे नोच डालना चाहते थे | मैंने लाख समझाने पर वह किसी तरह माने | मैंने इसका कारण जानना चाह तो उन्होंने भी देश में बढ़ती असहिष्णुता का हवाला दिया, अब मै चकीत हो उनकी बाते सुनाने लगा | उन्होंने समझाया की इस बढ़ती असहिष्णुता के प्रभाव से वह भी वंचीत नहीं है| लोग बढ़ती असहिष्णुता से डरे हुए है, और रातो को सो नहीं पाते, और मेरे खटमल मित्रो को कई दिनों से भूखे पेट सोना पड़ता था | इन इंसानों में बढ़ती असहिष्णुता  का शिकार मेरे खटमल मित्र हो रहे थे | उनका कहना था की अगर इस देश में इसी तरह असहिष्णुता बढ़ती रही, तो मजबूरन पलायन कर जायेंगे | अंततः तब जाकर मुझे असहिष्णुता की एक झलक देखने को मिली, और बढ़ती असहिष्णुता के कारण भविष्य के संकट को देख सका |

सभी को सहिष्णुता वाला "नमस्कार" |

Wednesday, November 4, 2015

बेचारे नेता जी

अचानक पुरा वातावरण शोर-गुल और व्यस्तता की भेट चढ़ गया | अभी कुछ देर पहले रामानंद पाण्डे जी चौक की दुकान पर बैठे चाय की चुस्की ले रहे थे, और किसी के आने क इंतज़ार कर रहे थे, जिनसे वे गप्पे लड़ा सके, लेकिन इस धुप भरी दोपहरी में कोई दिखाई ना दे रहा था | पुरे बाजार में श्मशान सा सन्नाटा पसरा हुआ था | गर्मी में उमस बहुत ज्यादा थी | अब जब दिन ढलने को था और सूरज चलने की तैयारी में था, पाण्डे जी भी तीन - चार जम्हाई चोदने के बाद, भारी कदमो से घर की और चल ही दिए थे कि एक काफिला कई गाड़ियों के सथ धुल मिट्टी उड़ाते हुए आता दिखाई दिया | जब काफिला पास में पहुचा तो पाण्डे जी ने देखा एक नेता जी चुनाव प्रचार हेतु अपने पुरे दलबल के साथ पधारे है, नेता जी के चमचे गाड़ियों में खटमल की भाती लिपटे हुए थे, और नेता जी की प्रशंसा में नारे लगा रहे थे | पाण्डे जी ने भी कुछ सोचा और वापस आकर उसी दुकान की उसी बेंच पर यथावत बैठ गए | अभी तक जो चौक सन्नाटे की भेट चढ़ चुका था, नेता जी के आ जाने से पुरी तरह गुलजार हो चुका था | ऐसा लग रहा था, जैसे निर्जीव हो चुके वातावरण में नेता जी के आगमन ने पुनः जान डाल दी हो |
दुकानों पर चहल-पहल काफी बढ़ गयी थी, दुकान वाले ने पहले बासी समोसों को तेल में डालकर गर्म कर दिया, चाय की केतली लेकर बिना पूछे वहां मौजूद सभी व्यक्तियों को चाय दिया, पाण्डे जी को भी एक ग्लास मिला | सभी ने चाय ख़त्म की और समोसों पर पिल पड़े | पाण्डे जी ने भी मौक़ा हाँथ से ना जाने देते हुए, झट से एक प्लेट समोसे का ले लिया | अब आयी मुह मीठा करने की बारी, जिसके हिस्से में जो आया, सबने छककर खाया | लेकिन पाण्डे जी के काफी जद्दोजहद के बावजूद उनके हाथ जलेबी का सिर्फ एक टुकड़ा ही लगा | हालांकी, उन्होंने छोड़ा उसे भी नहीं, लेकिन अपनी असफलता पर गुस्सा हुए बिना ना रह सके | आब आये पान की बारी, सभी ने पान खाया | जो पाण्डे जी पान खाने वालो को जाहिल-गवार कहते नहीं थकते थे, आज खुद को भी पान खाने से ना रोक सके | फिर नेता जी का काफिला आगे बढ़ निकला |


लेकिन पाण्डे जी चाय के दुकान की उसी बेंच पर बैठे रहे | शायद इस आशा के साथ की शायद कोई मुर्गा मिल सके जिसे वे अपनी बातो से हलाल कर सके | नेता जी के काफिले के जाने के बाद कुछ आदमी वही रुक गए थे | उन्ही में से एक नौजवान ने कहा - "बहुत बड़े नेता है, इनके पिता जी तो सांसद रह चुके है, उनके बाद अभी ये बिधायकी में दाव अजमाने आये है |"

आभी उसने अपनी बात पुरी भी नहीं की थी कि पाण्डे जी बोले उठे - "खाक बड़े नेता है, पिछले चुनाव में चौधरी ने उन्हें पुरे २५,००० वोटो से हराया था |"

फिर उस नवयुवक ने उत्तर दिया - "लेकिन इस बार ये जीत जायेंगे, देखा नहीं कितने लोग थे इनके साथ |"

पाण्डे जी ने इस बार पूरा जोर लगाते हुए कहा - "पुरी निठल्लो की जमात थी, जिन्हें काम-काज नहीं है पेट के लिए पीछे-पीछे टहलते रहते है |"

पान की पीक थूकते हुए पाण्डे जी ने अपनी बात ख़त्म की, और उत्सुक नजरो से उस लडके की और देखने लगे |

लेकिन इस बार नवयुवक ने हार मान ली और उन्ही की हाँ-में-हाँ मिलते हुए कहा - "सिर्फ खाने के लिए थोड़े ही पूरा दिन कोई घूमता फिरता है, पूरे २५० रुपये दिए थे, औरतो को तो ४०० रुपये मिलते है एक दिन के हिसाब से, चाय, नाश्ता और खाना अलग से |"

पाण्डे जी कुछ कहना ही चाहते थे की फिर एक काफिला आता दिखाई दिया, सभी पुनः सक्रिय हो गए | जैसे ही काफिला चौक के पास पहुंचा, पाण्डे जी और उस युवक ने समय ना गवांते हुए जल्दी से वहां पहुचे और बोल उठे - "चौधरी साहब की जय, इन्ही को वोट देकर भारी मतों से विजयी बनाएं |"

और फिर वही सिलसिला ..... पहले चाय, फिर समोसे-जलेबी, मिठाई ....... और अंत में पान से मुख लाल |

थोड़ी देर बाद चौधरी साहब का काफिला भी आगे बढ़ गया, लेकिन पांडे जी उस युवक के साथ उसी चाय की दुकान पर एक और काफिले के इंतज़ार में बैठ गए, और चौधरी जी बुराइयां शुरू | चायवाला शुरू से अंत तक के इस घटनाक्रम को देख बरबस ही बोल उठा ...........बेचारे नेता जी !